Guru teg bahadur jayanti

करुणा, त्याग और प्रेम के प्रणेता गुरु तेग बहादुर सिंह की जयंती (Guru Teg Bahadur Jayanti)


गुरु तेग बहादुर (Guru Teg Bahadur)का असली नाम त्याग मल था लेकिन सिखों के आठवें गुरु और उनके पिता गुरु हरगोविंद ने उनकी बहादुरी को देखते हुए उन्हें तेग बहादुर का नाम दिया । गुरु तेग बहादुर सिखों के नौवेंं गुरु बने। और आगे चलकर गुरु तेग बहादुर ने मुगलों के नापाक इरादों को नाकाम किया।

गुरु तेग बहादुर सिंह एक क्रांतिकारी युग पुरुष थे। उनका जन्म वैसाख कृष्ण पंचमी को पंजाब के अमृतसर में हुआ था। गुरु तेग बहादुर अद्वितीय योद्धा थे। विश्व इतिहास में धर्म एवं मानवीय मूल्यों, आदर्शों एवं सिद्धांत की रक्षा के लिए प्राणों की आहुति देने वालों में गुरु तेग बहादुर साहब का स्थान अद्वितीय है।

सिखों के नौवें गुरु गुरु तेग बहादुर की पुण्यतिथि को शहीदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। गुरु तेग बहादुर 24 नवंबर 1675 को शहीद हुए थे। कुछ इतिहासकारों के अनुसार गुरु तेग बहादुर 11 नवंबर 1675 को शहीद हुए थे। इतिहास में उनका नाम सदा ही सम्मान के साथ लिया जाएगा।

 जब वे दिल्ली की ओर जा रहे थे तो रास्ते में मलिकपुर रंगड़ा गांव में सरहिंद के सूबेदार ने उन्हें बंदी बना लिया।
औरंगजेब तब दिल्ली से बाहर था। चार महीने तक गुरु तेग बहादुरजी सरहिंद की जेल में रहे। जब औरंगजेब दिल्ली आ गया तो गुरुजी व उनके साथियों को दिल्ली लाया गया। इसके बाद उन पर भयंकर अत्याचार का दौर शुरू हुआ।
तीन दिन तक उन्हें व उनके शिष्यों को पानी तक नहीं दिया गया। दिल्ली की कोतवाली के पास गुरुजी व उनके शिष्य लाए गए। पहले भाई मतिदास को आरे से चिरवाया गया। जब औरंगजेब का इससे भी मन नहीं भरा तो भाई दयालदास को खौलते पानी में डाला गया। गुरु तेग बहादुर को डराने की साजिश औरंगजेब ने बहुत की लेकिन वह कामयाब नहीं हो पाया।

गुरू तेग बहादुर औरंगजेब के सामने नहीं झुके और अपने शिष्यों के अद्भुत बलिदान का गुणगान करते रहे। इसके बाद भाई सतीदास के बदन पर रूई लपेट कर आग लगा दी गई। गुरुजी ने उसके बलिदान को धन्य-धन्य कहा।
शिष्यों के बलिदान के बाद गुरु तेग बहादुरजी ने अपना शीश बलिदान कर दिया। दिल्ली में शीशगंज गुरुद्वारा गुरु तेग बहादुरजी के उस महान बलिदान की स्मृति को आज भी ताजा कर देता है। 

मुगल बादशाह औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को सिर कटवा दिया था। औरंगजेब चाहता था कि सिख गुरु इस्लाम स्वीकार कर लें लेकिन गुरु तेग बहादुर ने इससे इनकार कर दिया था। गुरु तेग बहादुर के त्याग और बलिदान के लिए उन्हें “हिंद दी चादर” कहा जाता है। मुगल बादशाह ने जिस जगह पर गुरु तेग बहादुर का सिर कटवाया था दिल्ली में उसी जगह पर आज शीशगंज गुरुद्वारा स्थित है।

 गुरु तेग बहादुर का जन्म 18 अप्रैल 1621 को अमृतसर में हुआ था। गुरु तेग बहादुर का असली नाम त्याग मल था। उन्हें “करतारपुर की जंग” में मुगल सेना के खिलाफ अतुलनीय पराक्रम दिखाने के बाद तेग बहादुर नाम मिला। 16 अप्रैल 1664 को वो सिखों को नौवें गुरु बने थे।

मात्र 14 वर्ष की आयु में अपने पिता के साथ मुगलों के हमले के खिलाफ हुए युद्ध में उन्होंने अपनी वीरता का परिचय दिया। इस वीरता से प्रभावित होकर उनके पिता ने उनका नाम तेग बहादुर यानी तलवार के धनी रख दिया। 
गुरु तेग बहादुर सिंह जहां भी गए, उनसे प्रेरित होकर लोगों ने न केवल नशे का त्याग किया, बल्कि तंबाकू की खेती भी छोड़ दी। उन्होंने देश को दुष्टों के चंगुल से छुड़ाने के लिए जनमानस में विरोध की भावना भर, कुर्बानियों के लिए तैयार किया और मुगलों के नापाक इरादों को नाकामयाब करते हुए कुर्बान हो गए। 

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