अनुरोधवती नामक बाइसवीं पुतली ने जो कथा सुनाई वह इस प्रकार है-

राजा विक्रमादित्य अद्भुत गुणग्राही थे। वे सच्चे कलाकारों का बहुत अधिक सम्मान करते थे तथा स्पष्टवादिता पसंद करते थे। उनके दरबार में योग्यता का सम्मान किया जाता था। चापलूसी जैसे दुर्गुण की उनके यहां कोई कद्र नहीं थी। यही सुनकर एक दिन एक युवक उनसे मिलने उनके द्वार तक आ पहुंचा।

दरबार में महफिल सजी हुई थी और संगीत का दौर चल रहा था। वह युवक द्वार पर राजा की अनुमति का इंतज़ार करने लगा। वह युवक बहुत ही गुणी था। बहुत सारे शास्‍त्रों का ज्ञाता था। कई राज्यों में नौकरी कर चुका था। स्पष्टवक्ता होने के कारण उसके आश्रयदाताओं को वह धृष्ट नज़र आया,

अत:हर जगह उसे नौकरी से निकाल दिया गया।

इतनी ठोकरें खाने के बाद भी उसकी प्रकृति तथा व्यवहार में कोई परिवर्तन नहीं आ सका।

वह द्वार पर खड़ा था, तभी उसके कान में वादन का स्वर पड़ा और वह बड़बड़ाया- 'महफिल में बैठे हुए लोग मूर्ख हैं। संगीत का आनन्द उठा रहे हैं, मगर संगीत का जरा भी ज्ञान नहीं है। साज़िन्दा गलत राग बजाए जा रहा है, लेकिन कोई भी उसे मना नहीं कर रहा है।'

उसकी बड़बड़ाहट द्वारपाल को स्पष्ट सुनाई पड़ी। उसका चेहरा क्रोध से लाल हो गया। उसने उसको सम्भालकर टिप्पणी करने को कहा।
उसने जब उस युवक को कहा कि महाराज विक्रमादित्य खुद महफिल में बैठे हैं और वे बहुत बड़े कला पारखी हैं तो युवक ने उपहास किया। उसने द्वारपाल को कहा कि वे कलाप्रेमी हो सकते हैं, मगर कला पारखी नहीं, क्योंकि साजिन्दे का दोषपूर्ण वादन उनकी समझ में नहीं आ रहा है। उस युवक ने यह भी बता दिया कि वह साज़िन्दा किस तरफ बैठा हुआ है।

अब द्वारपाल से नहीं रहा गया। उसने उस युवक से कहा कि उसे राजदण्ड मिलेगा, अगर उसकी बात सच साबित नहीं हुई। उस युवक ने उसे सच्चाई का पता लगाने के लिए कहा तथा बड़े ही आत्मविश्वास से कहा कि वह हर दण्ड भुगतने को तैयार है अगर यह बात सच नहीं साबित हुई। द्वारपाल अन्दर गया तथा राजा के कानों तक यह बात पहुंची।

विक्रम ने तुरन्त आदेश किया कि वह युवक महफिल में पेश किया जाए। विक्रम के सामने भी उस युवक ने एक दिशा में इशारा करके कहा कि वहां एक वादक की अंगुली दोषपूर्ण है। उस ओर बैठे सारे वादकों की अंगुलियों का निरीक्षण किया जाने लगा। सचमुच एक वादक के अंगूठे का ऊपरी भाग कटा हुआ था और उसने उस अंगूठे पर पतली खाल चढ़ा रखी थी।

राजा उस युवक के संगीत ज्ञान के कायल हो गए। तब उन्होंने उस युवक से उसका परिचय प्राप्त किया और अपने दरबार में उचित सम्मान देकर रख लिया।
वह युवक सचमुच ही बड़ा ज्ञानी और कला मर्मज्ञ था। उसने समय-समय पर अपनी योग्यता का परिचय देकर राजा का दिल जीत लिया। एक दिन दरबार में एक अत्यंत रूपवती नर्तकी आई। उसके नृत्य का आयोजन हुआ और कुछ ही क्षणों में महफिल सज गई।

वह युवक भी दरबारियों के बीच बैठा हुआ नृत्य और संगीत का आनन्द उठाने लगा। वह नर्तकी बहुत ही सधा हुआ नृत्य प्रस्तुत कर रही थी और दर्शक मुग्ध होकर रसास्वादन कर रहे थे। तभी न जाने कहां से एक भंवरा आकर उसके वक्ष पर बैठ गया।

नर्तकी नृत्य नहीं रोक सकती थी और न ही अपने हाथों से भंवरे को हटा सकती थी, क्योंकि भंगिमाएं गड़बड़ हो जातीं। उसने बड़ी चतुरता से सांस अन्दर की ओर खींची तथा पूरे वेग से भंवरे पर छोड़ दी। अनायास निकले सांस के झौंके से भंवरा डरकर उड़ गया। क्षणभर की इस घटना को कोई भी न ताड़ सका, मगर उस युवक की आंखों ने सब कुछ देख लिया।

वह 'वाह! वाह!' करते उठा और अपने गले की मोतियों की माला उस नर्तकी के गले में डाल दी। सारे दरबारी स्तब्ध रह गए। अनुशासनहीनता की पराकाष्ठा हो गई।
राजा की उपस्थिति में दरबार में किसी और के द्वारा कोई पुरस्कार दिया जाना राजा का सबसे बड़ा अपमान माना जाता था। विक्रम को भी यह पसंद नहीं आया और उन्होंने उस युवक को इस धृष्टता के लिए कोई ठोस कारण देने को कहा।

तब युवक ने राजा को भंवरे वाली सारी घटना बता दी। उसने कहा कि बिना नृत्य की एक भी भंगिमा को नष्ट किए, लय-ताल के साथ सामंजस्य रखते हुए इस नर्तकी ने जिस सफ़ाई से भंवरे को उड़ाया वह पुरस्कार योग्य चेष्टा थी।

उसे छोड़कर किसी और का ध्यान गया ही नहीं तो पुरस्कार कैसे मिलता। विक्रम ने नर्तकी से पूछा तो उसने उस युवक की बातों का समर्थन किया। विक्रम का क्रोध गायब हो गया और उन्होंने नर्तकी तथा उस युवक, दोनों की बहुत तारीफ की। अब उनकी नज़र में उस युवक का महत्व और बढ़ गया। जब भी कोई समाधान ढूंढना रहता उसकी बातों को ध्यान से सुना जाता तथा उसके परामर्श को गंभीरतापूर्वक लिया जाता।

एक बार दरबार में बुद्धि और संस्कार पर चर्चा छिड़ी। दरबारियों का कहना था कि संस्कार बुद्धि से आते हैं, पर वह युवक उनसे सहमत नहीं था। उसका कहना था कि सारे संस्कार वंशानुगत होते हैं। जब कोई मतैक्य नहीं हुआ तो विक्रम ने एक हल सोचा।
उन्होंने नगर से दूर हटकर जंगल में एक महल बनवाया तथा महल में गूंगी और बहरी नौकरानियां नियुक्त कीं।

एक-एक करके चार नवजात शिशुओं को उस महल में उन नौकरानियों की देखरेख में छोड़ दिया गया। उनमें से एक उनका, एक महामंत्री का, एक कोतवाल का तथा एक ब्राह्मण का पुत्र था। बारह वर्ष पश्चात जब वे चारों दरबार में पेश किए गए तो विक्रम ने बारी-बारी से उनसे पूछा- 'कुशल तो हैं?' चारों ने अलग-अलग जवाब दिए।

राजा के पुत्र ने 'सब कुशल हैं' कहा, जबकि महामंत्री के पुत्र ने संसार को नश्वर बताते हुए कहा 'आने वाले को जाना है तो कुशलता कैसी?' कोतवाल के पुत्र ने कहा कि चोर चोरी करते हैं और बदनामी निरपराध की होती है।

ऐसी हालत में कुशलता की सोचना बेमानी है। सबसे अन्त में ब्राह्मण पुत्र का जवाब था कि आयु जब दिन-ब-दिन घटती जाती है तो कुशलता कैसी? चारों के जवाबों को सुनकर उस युवक की बातों की सच्चाई सामने आ गई। राजा का पुत्र निश्चिन्त भाव से सब कुछ कुशल मानता था और मंत्री के पुत्र ने तर्कपूर्ण उत्तर दिया।

इसी तरह कोतवाल के पुत्र ने न्याय व्यवस्था की चर्चा की, जबकि ब्राह्मण पुत्र ने दार्शनिक उत्तर दिया। सब वंशानुगत संस्कारों के कारण हुआ। सबका पालन-पोषण एक वातावरण में हुआ, लेकिन सबके विचारों में अपने संस्कारों के अनुसार भिन्नता आ गई। सभी दरबारियों ने मान लिया कि उस युवक का मानना बिलकुल सही है।

पहली पुतली रत्नमंजरी- राजा विक्रम के जन्म तथा सिंहासन प्राप्ति की कहानी

दूसरी पुतली चित्रलेखा - राजा विक्रम और बेताल की कहानी

तीसरी पुतली चन्द्रकला - पुरुषार्थ और भाग्य में कौन बड़ा!

चौथी पुतली कामकंदला ~ विक्रमादित्य की दानवीरता तथा त्याग की भावना

पाँचवीं पुतली लीलावती - विक्रमादित्य की दानवीरता

छठी पुतली रविभामा - राजा विक्रमादित्य की परीक्षा!

सातवीं पुतली कौमुदी -  विक्रमादित्य और पिशाचिनी

आठवीं पुतली पुष्पवती - विक्रमादित्य और काठ का घोड़ा

नवीं पुतली मधुमालती - विक्रमादित्य और प्रजा का हित!

दसवीं पुतली प्रभावती - विक्रमादित्य और राजकुमारी का विवाह

ग्यारहवीं पुतली  त्रिलोचनी -राजा विक्रमादित्य और देवताओं का आवाहन

बारहवी पुतली  पद्मावती - विक्रमादित्य का राक्षस से घमासान युद्ध

तेरहवीं पुतली  कीर्तिमती -  विक्रमादित्य और सर्वश्रेष्ठ दानवीर!

चौदहवीं पुतली सुनयना - विक्रमादित्य और हिंसक सिंह का शिकार

पन्द्रहवीं पुतली  सुंदरवती - राजा की हर चीज़ प्रजा के हित की रक्षा के लिए होती है

सोलहवीं पुतली सत्यवती -  राजा विक्रमादित्य और पाताल लोक की यात्रा

सत्रहवीं पुतली  विद्यावती ~ विक्रमादित्य की परोपकार तथा त्याग की भावना

अठारहवीं पुतली  तारामती - विक्रमादित्य और विद्वानों तथा कलाकारों का सम्मान

उन्नीसवी पुतली रूपरेखा ~ राजा विक्रमादित्य और दो तपस्वी singhasan battisi

बीसवीं पुतली  ज्ञानवती - राजा विक्रमादित्य तथा ज्ञानियों की कद्र Singhasan battisi

इक्कीसवीं पुतली चन्द्रज्योति ~ विक्रमादित्य और दुर्लभ ख्वांग बूटी singhasan battisi

तेइसवीं पुतली धर्मवती ~ मनुष्य जन्म से बड़ा होता है या कर्म से

चौबीसवीं पुतली करुणावती ~ चरित्रहीन स्त्री से प्रेम सिर्फ विनाश की ओर ले जाता है

पच्चीसवीं पुतली त्रिनेत्री ~ ईश्वर से आस

छब्बीसवीं पुतली मृगनयनी ~ रानी का विश्वासघात singhasan battisi

सताइसवीं पुतली मलयवती ~ विक्रमादित्य और दानवीर राजा बलि singhasan battisi

अट्ठाईसवीं पुतली वैदेही ~ स्वर्ग की यात्रा Singhasan battisi

उन्तीसवीं पुतली मानवती ~ राजा विक्रम की बहन की शादी

तीसवीं पुतली जयलक्ष्मी की कथा - मृग रूप से मुक्ति singhasan batiisi

इकत्तीसवीं पुतली कौशल्या ~ विक्रमादित्य की मृत्यु singhasan battisi

बत्तीसवीं पुतली रानी रूपवती ~ अंतिम कहानी singhasan battisi

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