Pradosh vrat

स्कंद पुराण के अनुसार प्रत्येक माह की दोनों पक्षों की त्रयोदशी के दिन संध्याकाल के समय को "प्रदोष" कहा जाता है और इस दिन शिवजी को प्रसन्न करने के लिए प्रदोष व्रत रखा जाता है।



    प्रदोष व्रत 2020 Pradosh vrat kab hai | Pradosh vrat date


    08 जनवरी ( बुधवार ) - प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    22 जनवरी ( बुधवार ) - प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    06 फरवरी ( गुरुवार ) - प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    20 फरवरी ( गुरुवार ) - प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    07 मार्च ( शनिवार ) - शनि प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    21 मार्च ( शनिवार ) - शनि प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    05 अप्रैल ( रविवार ) - प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    20 अप्रैल (सोमवार) - सोम प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    05 मई ( मंगलवार ) - भौम प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    19 मई ( मंगलवार ) भौम प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    03 जून ( बुधवार ) प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    18 जून ( गुरुवार ) प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    02 जुलाई ( गुरुवार ) प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    18 जुलाई ( शनिवार ) शनि प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    01 अगस्‍त ( शनिवार ) शनि प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    16 अगस्‍त ( रविवार ) प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    30 अगस्‍त ( रविवार ) प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    15 सितंबर ( मंगलवार ) भौम प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    29 सितंबर ( मंगलवार ) भौम प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    14 अक्‍टूबर ( बुधवार ) प्रदोष व्रत ( कृष्ण )
    28 अक्‍टूबर ( बुधवार ) प्रदोष व्रत ( शुक्ल )
    13 नवंबर ( शुक्रवार ) प्रदोष व्रत ( कृष्ण )



    प्रदोष व्रत कथा Pradosh vrat katha

    स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक विधवा ब्राह्मणी अपने पुत्र को लेकर भिक्षा लेने जाती और संध्या को लौटती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी तो उसे नदी किनारे एक सुन्दर बालक दिखाई दिया जो विदर्भ देश का राजकुमार धर्मगुप्त था। शत्रुओं ने उसके पिता को मारकर उसका राज्य हड़प लिया था। उसकी माता की मृत्यु भी अकाल हुई थी। ब्राह्मणी ने उस बालक को अपना लिया और उसका पालन-पोषण किया।

    कुछ समय पश्चात ब्राह्मणी दोनों बालकों के साथ देवयोग से देव मंदिर गई। वहां उनकी भेंट ऋषि शाण्डिल्य से हुई। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को बताया कि जो बालक उन्हें मिला है वह विदर्भदेश के राजा का पुत्र है जो युद्ध में मारे गए थे और उनकी माता को ग्राह ने अपना भोजन बना लिया था। ऋषि शाण्डिल्य ने ब्राह्मणी को प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। ऋषि आज्ञा से दोनों बालकों ने भी प्रदोष व्रत करना शुरू किया।

    एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएं नजर आई। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया किंतु राजकुमार धर्मगुप्त "अंशुमती" नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगे। गंधर्व कन्या और राजकुमार एक दूसरे पर मोहित हो गए, कन्या ने विवाह हेतु राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने के लिए बुलाया। दूसरे दिन जब वह पुन: गंधर्व कन्या से मिलने आया तो गंधर्व कन्या के पिता ने बताया कि वह विदर्भ देश का राजकुमार है। भगवान शिव की आज्ञा से गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार धर्मगुप्त से कराया।

    इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः आधिपत्य प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त के प्रदोष व्रत करने का फल था। स्कंदपुराण के अनुसार जो भक्त प्रदोषव्रत के दिन शिवपूजा के बाद एक्राग होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है उसे सौ जन्मों तक कभी दरिद्रता नहीं होती।

    प्रदोष व्रत के फल Pradosh vrat benefits

    प्रदोष व्रत का फल वार अनुसार अलग अलग होता है 

    सोम प्रदोष व्रत। 

    यह सोमवार को आता है इसलिए इसे 'सोम प्रदोष' कहा जाता है। इस दिन व्रत रखने से भक्तों के अन्दर सकारात्मक विचार आते है और वह अपने जीवन में सफलता प्राप्त करते है।

    मंगल प्रदोष या भौम प्रदोष व्रत।

    जब प्रदोष व्रत मंगलवार को आता है तो इसे 'भौम प्रदोष' कहा जाता है। इस व्रत को रखने से भक्तों की स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याए दूर होती है और उनके 
    शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार आता है। भौम प्रदोष व्रत जीवन में समृद्धि लाता है।

    बुध प्रदोष या सौम्य वारा प्रदोष व्रत।

    सौम्य वारा प्रदोष बुधवार को आता है। इस शुभ दिन पर व्रत रखने से भक्तों की इच्छाएं पूरी होती है और ज्ञान भी प्राप्त  होता है। 

    गुरु प्रदोष व्रत। 

    यह व्रत गुरुवार को आता है और इस उपवास को रख कर भक्त अपने सभी मौजूदा खतरों को समाप्त कर सकते हैं। इसके अलावा गुरुवार प्रदोष व्रत रखने से पूर्वजों का आशीर्वाद मिलता है। 

    शुक्र प्रदोष या भृगु वारा प्रदोष व्रत।

    जब प्रदोष व्रत शुक्रवार को मनाया जाता है तो उसे भृगु वार प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस व्रत को करने से जीवन से नकारात्मकता समाप्त होती है और 
    सफलता मिलती है।


    शनि प्रदोष व्रत। शनि प्रदोष व्रत


    शनिवार को आता है और सभी प्रदोष व्रतों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। जो व्यक्ति इस दिन व्रत रखता है वह खोये हुए धन की प्राप्ति करता है और 

    जीवन में सफलता प्राप्त करता है।


    रवि प्रदोष या भानु वारा प्रदोष व्रत।


    यह रविवार को आता है और भानु वारा प्रदोष व्रत का लाभ यह है कि भक्त उस दिन उपवास को रखकर दीर्घायु और शांति प्राप्त कर सकते है।


    शिवजी होंगे प्रसन्न यदि इस विधि सेकरेंगे प्रदोष व्रत

    व्रत रखने वाले व्यक्ति को व्रत के दिन सूरज उदय होने से पहले उठना चाहिये। फिर नित्य कार्य कर के मन में भगवान शिव का नाम जपते रहना चाहिये। 
    व्रत में किसी भी प्रकार का आहार ना खाएं। सुबह नहाने के बाद साफ और सफेद रंग के कपड़े पहनें। 
    अपने घर के मंदिर को साफ पानी या गंगा जल से शुद्ध करें और फिर उसमें गाय के गोबर से लीप कर मंडप तैयार करें। इस मंडप के नीचे 5 अलग अलग रंगों का प्रयोग कर के रंगोली बनाएं। फिर उतर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठे और शिव जी की पूजा करें। पूजा में 'ऊँ नमः शिवाय' का जाप कर और जल चढ़ाएं।

    प्रदोष व्रत उद्यापन विधि | Pradosh Vrat Udyapan Vidhi


    स्कंद पुराण के अनुसार व्रती को कम-से-कम 11 अथवा 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करना चाहिये। उद्यापन के एक दिन पहले( यानी द्वादशी तिथि को) श्री गणेश भगवान का विधिवत षोडशोपचार विधि से पूजन करें तथा पूरी 

    रात शिव-पार्वती और श्री गणेश जी के भजनों के साथ जागरण करें। उद्यापन के दिन प्रात:काल उठकर नित्य कर्मों से निवृत हो जायें। स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा गृह को शुद्ध करें। पूजा स्थल पर 
    रंगीन वस्त्रों और रंगोली से मंडप बनायें । मण्डप में एक चौकी अथवा पटरे पर शिव-पार्वती की प्रतिमा स्थापित करें। अब शिव-पार्वती की विधि-विधान से
    पूजा करें। भोग लगायें। उस दिन जो भी वार हो उस वार की त्रयोदशी कथा सुने अथवा सुनायें।

    अब हवन के लिये सवा किलो (1.25 किलोग्राम) आम की लकड़ी का हवन कुंड में सजायें। हवन के लिये गाय के दूध में खीर बनायें। हवन कुंड का पूजन करें। दोनों हाथ जोड़कर हवन कुण्ड को 

    प्रणाम करें। अब अग्नि प्रज्वलित करें। तंत्र शिव-पार्वती के उद्देश्य से खीर से 'ऊँ उमा सहित शिवाय नम:' मंत्र का उच्चारण करते हुए 108 बार आहुति दें। हवन पूर्ण होने के पश्चात् शिव जी की आरती करें। ब्राह्मणों को सामर्थ्यानुसार दान दें एवं भोजन करायें। आप अपने इच्छानुसार एक या दो या पाँच ब्राह्मणों को भोजन एवं दान करा सकते हैं। यदि 
    भोजन कराना सम्भव न हो तो किसी मंदिर में यथाशक्ति दान करें। इसके बाद बंधु बांधवों सहित प्रसाद ग्रहण करें। और भोजन करें।

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