Poem in Hindi about nature | poem on nature in hindi

प्रकृति -Nature का हमारे जीवन में विशेष महत्व है। प्रकृति के द्वारा हमें शुद्ध वायु जल प्रकाश और ढेर सारी चीजें मिलती हैं । प्रकृति को हमारे देश में मां की संज्ञा दी गई है ।लेकिन मनुष्य का प्रकृति के प्रति गलत व्यवहार बढ़ता जा रहा है। हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं, जिसके कारण हमें बुरे परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं।

Poem in hindi on nature
Poem in hindi on nature

Poem in hindi on nature 

हमें लोगों को Nature के प्रति जागरूक करना बहुत जरूरी है जिससे प्रकृति के संसाधनों को बर्बाद होने से बचाया जा सके । अतः विद्यालयों में प्रकृति से संबंधित बहुत सारी कविताएं सुनाइए और पढ़ाई जाती हैं। अतः हम आपके लिए प्रकृति से संबंधित कविताएं Poem on nature लेकर आए हैं जिससे आप प्रकृति के प्रति जागरूक हो सकें और प्रकृति को बचाने में मदद करें।

चारु चंद्र की चंचल किरणें -मैथिलीशरण गुप्त

Charu chandra ki chanchal kirne~ maithili sharan gupt

Poem in hindi on nature

चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,
स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।
पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,
मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥

पंचवटी की छाया में है, सुन्दर पर्ण-कुटीर बना,
जिसके सम्मुख स्वच्छ शिला पर, धीर वीर निर्भीकमना,
जाग रहा यह कौन धनुर्धर, जब कि भुवन भर सोता है?
भोगी कुसुमायुध योगी-सा, बना दृष्टिगत होता है॥

किस व्रत में है व्रती वीर यह, निद्रा का यों त्याग किये,
राजभोग्य के योग्य विपिन में, बैठा आज विराग लिये।
बना हुआ है प्रहरी जिसका, उस कुटीर में क्या धन है,
जिसकी रक्षा में रत इसका, तन है, मन है, जीवन है!

मर्त्यलोक-मालिन्य मेटने, स्वामि-संग जो आई है,
तीन लोक की लक्ष्मी ने यह, कुटी आज अपनाई है।
वीर-वंश की लाज यही है, फिर क्यों वीर न हो प्रहरी,
विजन देश है निशा शेष है, निशाचरी माया ठहरी॥

 कोई पास न रहने पर भी, जन-मन मौन नहीं रहता;
 आप आपकी सुनता है वह, आप आपसे है कहता।
 बीच-बीच मे इधर-उधर निज दृष्टि डालकर मोदमयी,
 मन ही मन बातें करता है, धीर धनुर्धर नई नई-

क्या ही स्वच्छ चाँदनी है यह, है क्या ही निस्तब्ध निशा;
 है स्वच्छन्द-सुमंद गंधवह, निरानंद है कौन दिशा?
बंद नहीं, अब भी चलते हैं, नियति-नटी के कार्य-कलाप,
 पर कितने एकान्त भाव से, कितने शांत और चुपचाप!

है बिखेर देती वसुंधरा, मोती, सबके सोने पर,
 रवि बटोर लेता है उनको, सदा सवेरा होने पर।
 और विरामदायिनी अपनी, संध्या को दे जाता है,
 शून्य श्याम-तनु जिससे उसका, नया रूप झलकाता है।

 सरल तरल जिन तुहिन कणों से, हँसती हर्षित होती है,
 अति आत्मीया प्रकृति हमारे, साथ उन्हींसे रोती है!
अनजानी भूलों पर भी वह, अदय दण्ड तो देती है,
 पर बूढों को भी बच्चों-सा, सदय भाव से सेती है॥

 तेरह वर्ष व्यतीत हो चुके, पर है मानो कल की बात,
 वन को आते देख हमें जब, आर्त्त अचेत हुए थे तात।
 अब वह समय निकट ही है जब, अवधि पूर्ण होगी वन की।
 किन्तु प्राप्ति होगी इस जन को, इससे बढ़कर किस धन की!

और आर्य को, राज्य-भार तो, वे प्रजार्थ ही धारेंगे,
 व्यस्त रहेंगे, हम सब को भी, मानो विवश विसारेंगे।
 कर विचार लोकोपकार का, हमें न इससे होगा शोक;
 पर अपना हित आप नहीं क्या, कर सकता है यह नरलोक!


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वर्षा ने आज विदाई ली - माखन लाल चतुर्वेदी

Poem on nature in hindi 


वर्षा ने आज विदाई ली जाड़े ने कुछ अंगड़ाई ली
 प्रकृति ने पावस बूँदो से रक्षण की नव भरपाई ली।

 सूरज की किरणों के पथ से काले काले आवरण हटे
 डूबे टीले महकन उठ्ठी दिन की रातों के चरण हटे।

 पहले उदार थी गगन वृष्टि अब तो उदार हो उठे खेत
 यह ऊग ऊग आई बहार वह लहराने लग गई रेत।

 ऊपर से नीचे गिरने के दिन रात गए छवियाँ छायीं
 नीचे से ऊपर उठने की हरियाली पुन: लौट आई।

 अब पुन: बाँसुरी बजा उठे ब्रज के यमुना वाले कछार
 धुल गए किनारे नदियों के धुल गए गगन में घन अपार।

 अब सहज हो गए गति के वृत जाना नदियों के आर पार
 अब खेतों के घर अन्नों की बंदनवारें हैं द्वार द्वार।

 नालों नदियों सागरो सरों ने नभ से नीलांबर पाए
 खेतों की मिटी कालिमा उठ वे हरे हरे सब हो आए।

 मलयानिल खेल रही छवि से पंखिनियों ने कल गान किए
 कलियाँ उठ आईं वृन्तों पर फूलों को नव मेहमान किए।

 घिरने गिरने के तरल रहस्यों का सहसा अवसान हुआ
 दाएँ बाएँ से उठी पवन उठते पौधों का मान हुआ।

 आने लग गई धरा पर भी मौसमी हवा छवि प्यारी की
 यादों में लौट रही निधियाँ मनमोहन कुंज विहारी की।


ये मेघ साहसिक सैलानी / अज्ञेय

Ye megh sahsik sailani ~ Agyey


ये मेघ साहसिक सैलानी!
ये तरल वाष्प से लदे हुए
 द्रुत साँसों से लालसा भरे
 ये ढीठ समीरण के झोंके
 कंटकित हुए रोएं तन के
 किन अदृश करों से आलोड़ित
 स्मृति शेफाली के फूल झरे!

झर झर झर झर
 अप्रतिहत स्वर
 जीवन की गति आनी-जानी!

झर -
नदी कूल के झर नरसल
 झर - उमड़ा हुआ नदी का जल
 ज्यों क्वारपने की केंचुल में
 यौवन की गति उद्दाम प्रबल

 झर -
दूर आड़ में झुरमुट की
 चातक की करूण कथा बिखरी
 चमकी टिटीहरी की गुहार
 झाऊ की साँसों में सिहरी
 मिल कर सहसा सहमी ठिठकीं
 वे चकित मृगी सी आँखडि़याँ
 झर!सहसा दर्शन से झंकृत
 इस अल्हड़ मानस की कड़ियाँ!

झर -
अंतरिक्ष की कौली भर
 मटियाया सा भूरा पानी
 थिगलियाँ भरे छीजे आँचल-सी
 ज्यों-त्यों बिछी धरा धानी
 हम कुंज-कुंज यमुना-तीरे
 बढ़ चले अटपटे पैरों से
 छिन लता-गुल्म छिन वानीरे
 झर झर झर झर
 द्रुत मंद स्वर
 आये दल बल ले अभिमानी
 ये मेघ साहसिक सैलानी!

कम्पित फरास की ध्वनि सर सर
 कहती थी कौतुक से भर कर
 पुरवा पछवा हरकारों से
 कह देगा सब निर्मम हो कर
 दो प्राणों का सलज्ज मर्मर
 औत्सुक्य-सजल पर शील-नम्र
 इन नभ के प्रहरी तारों से!

ओ कह देते तो कह देते
 पुलिनों के ओ नटखट फरास!
ओ कह देते तो कह देते
 पुरवा पछवा के हरकारों
 नभ के कौतुक कंपित तारों
 हाँ कह देते तो कह देते
 लहरों के ओ उच्छवसित हास!
पर अब झर-झर
 स्मृति शेफाली
 यह युग-सरि का
 अप्रतिहत स्वर!
झर-झर स्मृति के पत्ते सूखे
 जीवन के अंधड़ में पिटते
 मरूथल के रेणुक कण रूखे!

झर -
जीवन गति आनी जानी
 उठती गिरतीं सूनी साँसें
 लोचन अन्तस प्यासे भूखे

 अलमस्त चल दिये छलिया से
 ये मेघ साहसिक सैलानी!




बसंत मनमाना -माखन लाल चतुर्वेदी

Basant manmana - Makhan lal chaturvedi


चादर-सी ओढ़ कर ये छायाएँ
 तुम कहाँ चले यात्री, पथ तो है बाएँ।

 धूल पड़ गई है पत्तों पर डालों लटकी किरणें
 छोटे-छोटे पौधों को चर रहे बाग़ में हिरणें,
दोनों हाथ बुढ़ापे के थर-थर काँपे सब ओर
 किन्तु आँसुओं का होता है कितना पागल ज़ोर-
बढ़ आते हैं, चढ़ आते हैं, गड़े हुए हों जैसे
 उनसे बातें कर पाता हूँ कि मैं कुछ जैसे-तैसे।
 पर्वत की घाटी के पीछे लुका-छिपी का खेल
 खेल रही है वायु शीश पर सारी दनिया झेल।

 छोटे-छोटे खरगोशों से उठा-उठा सिर बादल
 किसको पल-पल झांक रहे हैं आसमान के पागल?
ये कि पवन पर, पवन कि इन पर, फेंक नज़र की डोरी
 खींच रहे हैं किसका मन ये दोनों चोरी-चोरी?
फैल गया है पर्वत-शिखरों तक बसन्त मनमाना,
पत्ती, कली, फूल, डालों में दीख रहा मस्ताना।


बसन्तोत्सव -भगवतीचरण वर्मा


मस्ती से भरके जबकि हवा
 सौरभ से बरबस उलझ पड़ी
 तब उलझ पड़ा मेरा सपना
 कुछ नये-नये अरमानों से;
गेंदा फूला जब बागों में
 सरसों फूली जब खेतों में
 तब फूल उठी सहस उमंग
 मेरे मुरझाये प्राणों में;
कलिका के चुम्बन की पुलकन
 मुखरित जब अलि के गुंजन में
 तब उमड़ पड़ा उन्माद प्रबल
 मेरे इन बेसुध गानों में;
ले नई साध ले नया रंग
 मेरे आंगन आया बसंत
 मैं अनजाने ही आज बना
 हूँ अपने ही अनजाने में!
जो बीत गया वह बिभ्रम था,
वह था कुरूप, वह था कठोर,
मत याद दिलाओ उस काल की,
कल में असफलता रोती है!
जब एक कुहासे-सी मेरी
 सांसें कुछ भारी-भारी थीं,
दुख की वह धुंधली परछाँही
 अब तक आँखों में सोती है।
 है आज धूप में नई चमक
 मन में है नई उमंग आज
 जिससे मालूम यही दुनिया
 कुछ नई-नई सी होती है;
है आस नई, अभिलास नई
 नवजीवन की रसधार नई
 अन्तर को आज भिगोती है!
तुम नई स्फूर्ति इस तन को दो,
तुम नई नई चेतना मन को दो,
तुम नया ज्ञान जीवन को दो,
ऋतुराज तुम्हारा अभिनन्दन!


मधुर! बादल, और बादल, और बादल -माखन लाल चतुर्वेदी 


मधुर ! बादल, और बादल, और बादल आ रहे हैं
 और संदेशा तुम्हारा बह उठा है, ला रहे हैं।।

 गरज में पुस्र्षार्थ उठता, बरस में कस्र्णा उतरती
 उग उठी हरीतिमा क्षण-क्षण नया श्रृङ्गर करती
 बूँद-बूँद मचल उठी हैं, कृषक-बाल लुभा रहे हैं।।
 नेह! संदेशा तुम्हारा बह उठा है, ला रहे हैं।।

 तड़ित की तह में समायी मूर्ति दृग झपका उठी है
 तार-तार कि धार तेरी, बोल जी के गा उठी हैं
 पंथियों से, पंछियों से नीड़ के स्र्ख जा रहे हैं
 मधुर! बादल, और बादल, और बादल आ रहे हैं।।

 झाड़ियों का झूमना, तस्र्-वल्लरी का लहलहाना
 द्रवित मिलने के इशारे, सजल छुपने का बहाना।
 तुम नहीं आये, न आवो, छवि तुम्हारी ला रहे हैं।।
 मधुर! बादल, और बादल, और बादल छा रहे हैं,

और संदेशा तुम्हारा बह उठा है, ला रहे हैं।।


प्राकृतिक सौंदर्य / रामनरेश त्रिपाठी


नावें और जहाज नदी नद
सागर-तल पर तरते हैं।
पर नभ पर इनसे भी सुंदर
जलधर-निकर विचरते हैं॥
इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा
वृक्षों के शिखरों पर है।
जो धरती से नभ तक रचता
अद्भुत मार्ग मनोहर है॥
मनमाने निर्मित नदियों के
पुल से वह अति सुंदर है।
निज कृति का अभिमान व्यर्थ ही
करता अविवेकी नर है।

ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे

ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये हवाओ की सरसराहट
ये पेड़ो पर फुदकते चिड़ियों की चहचहाहट
ये समुन्दर की लहरों का शोर
ये बारिश में नाचते सुंदर मोर
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये खुबसूरत चांदनी रात
ये तारों की झिलमिलाती बरसात
ये खिले हुए सुन्दर रंगबिरंगे फूल
ये उड़ते हुए धुल
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे
ये नदियों की कलकल
ये मौसम की हलचल
ये पर्वत की चोटियाँ
ये झींगुर की सीटियाँ
कुछ कहना चाहती है हमसे
ये प्रकृति शायद कुछ कहना चाहती है हमसे

1 Comments

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